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औरंगजेब ही नहीं, ये मुस्लिम शासक भी था क्रूर और निर्दयी, इस हिंदू राजा ने हराकर लिया था नालंदा का बदला!

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फिल्म छावा की रिलीज़ के बाद से मुगल शासक औरंगज़ेब की क्रूरता के किस्से फिर ताज़ा हो गए हैं. वैसे ऐसा ही एक और मुस्लिम शासक था, जिसने सिर्फ खुन्नस में भारत की समृद्ध ज्ञानशाला को ही जलाकर खाक करा दिया था.

औरंगजेब ही नहीं, ये मुस्लिम शासक भी था क्रूर, इस हिंदू राजा ने लिया बदला!

खुन्नस में बख्तियार खिलजी ने लगाई थी लाइब्रेरी में आग.

भारत देश बहुत प्राचीन है और पिछले सैकड़ों सालों में यहां न जाने कितने आक्रांताओं ने आकर अपने झंडे गाड़े और इसके मूल को खत्म करने की कोशिश की. हालांकि सनातन धर्म और भारत की समृद्ध विरासत यूं ही खत्म नहीं हुई. हां, वे क्रूर शासक ज़रूर इतिहास बन गए, जिन्होंने यहां रहने वाले लोगों को सांस्कृतिक धरोहरों का नामोनिशान मिटाने की भरसक कोशिश की थी.

फिल्म छावा की रिलीज़ के बाद से मुगल शासक औरंगज़ेब की क्रूरता के किस्से फिर ताज़ा हो गए हैं. वैसे ऐसा ही एक और मुस्लिम शासक था, जिसने सिर्फ खुन्नस में भारत की समृद्ध ज्ञानशाला को ही जलाकर खाक करा दिया था. ये शायद दुनिया के इतिहास की पहली ऐसी घटना है, जहां किताबों से मानो बदला लिया गया था, ताकि धर्म विशेष और उससे जुड़े ज्ञान को खत्म किया जा सके.

बख्तियार खिलजी ने फूंक दिया ज्ञान का भंडार
1190 के दशक में तुर्क-अफगान सैन्य जनरल बख्तियार खिलजी ने एक ऐसी घटना को अंजाम दिया, जो इंसानों के प्रति ही नहीं बल्कि ज्ञान और संस्कृति के प्रति भी उसकी क्रूरता और बर्बरता को याद दिलाती रहेगी. उसकी अगुवाई में आक्रमणकारियों के एक समूह ने प्रसिद्ध नालंदा विश्वविद्यालय को नष्ट कर दिया. उत्तर और पूर्वी भारत की अपनी विजय के दौरान खिलजी ने बौद्ध ज्ञान के इस केंद्र को मिटाना चाहा. इसके पीछे भी कई मत हैं. कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी को खिलजी ने इसलिए फूंका क्योंकि यहां का ज्ञान इस्लाम से प्रतिस्पर्धा कर सकता था और उसे इससे ईर्ष्या थी. हालांकि कई इतिहासकार इसका खंडन करते हैं और उनका मानना है कि बौद्ध धर्म को खत्म करने के लिए उसने ऐसा किया.

3 महीने तक सुलगती रहीं किताबें
नालंदा 427 ईस्वी में स्थापित हुआ था और पूरे एशिया में ज्ञान का केंद्र था. ये आवासीय विश्वविद्यालय था, जिसे किले की तरह बनाया गया था. जिस वक्त बख्तियार ने नालंदा के पुस्तकालय में आग लगवाई थी, उस वक्त वहां पर 90 लाख से ज्यादा हस्तलिखित ताड़-पत्र पांडुलिपियां थीं. विश्वविद्यालय का परिसर इतना विशाल था कि यहां लगने वाली आग 3 महीने तक सुलगती रही. इससे पहले भी 5वीं सदी में हूणों और 8वीं सदी में गौड़ राजा के आक्रमण से इसे नुकसान हुआ था, लेकिन किसी ने भी यहां की लाइब्रेरी को यूं फूंका नहीं था. बख्तियार खिलजी ने अपने कुकर्म तब भोगे, जब राजा पृथु ने उसे इतनी बुरी तरह से हराया कि उसने फिर कभी कोई और लड़ाई नहीं लड़ी. वो शर्मिंदगी से फिर कभी युद्ध नहीं लड़ सका. राजा पृथु ने वास्तव में बख़्तियार खिलजी को हमेशा के लिए ख़त्म कर दिया था.

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